धनतेरस 2026: भगवान धन्वंतरि की कथा, पूजा मुहूर्त और विधि

Sumit Manwal
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लेखक: सुमित मनवाल | अपडेट: 5 नवंबर 2026

संक्षेप में उत्तर

धनतेरस 2026 शुक्रवार, 6 नवंबर को है। नई दिल्ली में धनतेरस पूजा का मुहूर्त शाम 6:02 से 7:57 बजे तक है। इस दिन समुद्र मंथन से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और कुबेर जी की पूजा होती है, और शाम को घर के द्वार पर यम दीपक जलाया जाता है।

धनतेरस 2026: समुद्र मंथन से अमृत कलश लेकर प्रकट होते भगवान धन्वंतरि

धनतेरस 2026
दीपावली के पाँच दिन के उत्सव का पहला दिन है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाने वाला यह पर्व केवल सोना-चाँदी या बर्तन खरीदने का दिन नहीं है। इसका असली नाम "धनत्रयोदशी" है और यह उस पावन क्षण की याद दिलाता है जब समुद्र मंथन से भगवान धन्वंतरि हाथ में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। इसी कारण इस दिन को आरोग्य का पर्व भी माना जाता है, क्योंकि शास्त्रों की दृष्टि में अच्छा स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है।

इस लेख में हम धनतेरस की तिथि और मुहूर्त, भगवान धन्वंतरि के प्रकट होने की कथा, यम दीपक से जुड़ी राजा हिम के पुत्र की कथा, घर पर करने योग्य सरल पूजा विधि और इस पर्व से मिलने वाली सीख को सरल हिंदी में समझेंगे।

धनतेरस 2026 की तिथि और पूजा मुहूर्त

द्रिक पंचांग के अनुसार इस वर्ष त्रयोदशी तिथि 6 नवंबर को सुबह शुरू होकर 7 नवंबर की सुबह तक रहेगी। धनतेरस की पूजा प्रदोष काल में, स्थिर लग्न (वृषभ लग्न) के समय करना सबसे शुभ माना जाता है।

विवरणसमय (नई दिल्ली)
धनतेरस (धनत्रयोदशी)शुक्रवार, 6 नवंबर 2026
त्रयोदशी तिथि प्रारंभ6 नवंबर, सुबह 10:30 बजे
त्रयोदशी तिथि समाप्त7 नवंबर, सुबह 10:47 बजे
प्रदोष कालशाम 5:33 से रात 8:09 बजे तक
वृषभ काल (स्थिर लग्न)शाम 6:02 से 7:57 बजे तक
धनतेरस पूजा मुहूर्तशाम 6:02 से 7:57 बजे तक (1 घंटा 56 मिनट)
यम दीपमशुक्रवार, 6 नवंबर 2026 (प्रदोष काल में)

समय नई दिल्ली (IST) के अनुसार, स्रोत: द्रिक पंचांग। आपके शहर में कुछ मिनट का अंतर हो सकता है।

एक सुंदर संयोग यह भी है कि इस बार धनतेरस शुक्रवार को पड़ रहा है और द्रिक पंचांग के अनुसार इसी दिन शुक्र प्रदोष व्रत भी है। शुक्रवार माता लक्ष्मी का दिन माना जाता है और प्रदोष भगवान शिव को प्रिय है, इसलिए श्रद्धालुओं के लिए यह दिन और भी मंगलमय है।

भगवान धन्वंतरि की कथा: समुद्र मंथन से अमृत कलश

पुराणों में वर्णन आता है कि एक समय देवता शक्तिहीन हो गए थे। तब भगवान विष्णु के परामर्श से देवताओं और असुरों ने मिलकर क्षीरसागर का मंथन करने का निश्चय किया। मंदराचल पर्वत को मथानी बनाया गया, नागराज वासुकि को रस्सी बनाया गया, और जब पर्वत समुद्र में डूबने लगा तो स्वयं श्रीहरि ने कच्छप (कछुआ) अवतार लेकर उसे अपनी पीठ पर धारण किया।

मंथन से सबसे पहले हलाहल विष निकला, जिसकी ज्वाला से तीनों लोक व्याकुल हो उठे। तब करुणा के सागर भोलेनाथ ने वह विष अपने कंठ में धारण कर लिया और "नीलकंठ" कहलाए। इसके बाद एक-एक करके चौदह रत्न निकले, जिनमें कामधेनु, ऐरावत हाथी, कल्पवृक्ष और स्वयं माता लक्ष्मी भी थीं, जिन्होंने भगवान विष्णु का वरण किया।

मंथन के अंत में एक दिव्य पुरुष प्रकट हुए। उनका शरीर तेज से दमक रहा था, चार भुजाओं में शंख, चक्र, औषधियाँ और अमृत से भरा स्वर्ण कलश था। ये थे भगवान धन्वंतरि, जिन्हें भगवान विष्णु का अंशावतार और आयुर्वेद का आदि देव माना जाता है। परंपरा के अनुसार वह पावन दिन कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी था, इसीलिए इस तिथि को धन्वंतरि जयंती के रूप में भी पूजा जाता है।

इस कथा से मिलने वाली सीख

  • धैर्य का फल: अमृत सबसे अंत में निकला। जीवन में भी सबसे मूल्यवान फल लंबे परिश्रम और धैर्य के बाद ही मिलता है।
  • पहले विष, फिर अमृत: कठिनाइयाँ पहले आती हैं। भोलेनाथ की तरह जो दूसरों के लिए कष्ट सह लेता है, वही सच्चा महान है।
  • आरोग्य ही धन: धन्वंतरि जी अमृत और औषधि लेकर आए, सोना लेकर नहीं। इसलिए इस दिन स्वास्थ्य की प्रार्थना सबसे पहले की जाती है।

यम दीपक की कथा: राजा हिम के पुत्र की रक्षा

धनतेरस की शाम घर के मुख्य द्वार पर जलता मिट्टी का चौमुखा यम दीपक और रंगोली


धनतेरस की शाम घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर एक दीपक जलाने की परंपरा है, जिसे यम दीपक या यम दीपम कहते हैं। इसके पीछे एक मार्मिक लोककथा प्रचलित है।

प्राचीन काल में हिम नाम के एक राजा थे। उनके घर पुत्र का जन्म हुआ तो ज्योतिषियों ने बताया कि विवाह के चौथे दिन सर्पदंश से इस बालक की मृत्यु का योग है। समय बीता, राजकुमार बड़ा हुआ और उसका विवाह एक बुद्धिमान और श्रद्धालु राजकुमारी से हुआ। राजकुमारी को जब यह बात पता चली, तो उसने भय के स्थान पर भक्ति और विवेक का मार्ग चुना।

चौथे दिन की रात उसने अपने पति को सोने नहीं दिया। शयन कक्ष के द्वार पर उसने अपने सारे सोने-चाँदी के आभूषणों का ढेर लगा दिया और चारों ओर अनगिनत दीपक जला दिए। फिर वह पूरी रात भगवान का नाम लेती रही और भजन व कथाएँ सुनाती रही। आधी रात को जब यमराज सर्प का रूप लेकर वहाँ पहुँचे, तो दीपकों और आभूषणों की चमक से उनकी आँखें चौंधिया गईं। वे कक्ष में प्रवेश न कर सके और आभूषणों के ढेर पर बैठकर मधुर भजन सुनते रहे। भोर होते ही मृत्यु का समय बीत गया और यमराज चुपचाप लौट गए।

इस प्रकार एक पत्नी की श्रद्धा, जागरण और दीपों के प्रकाश ने अकाल मृत्यु को टाल दिया। तभी से धनतेरस की शाम यमराज के नाम से दीपदान करने की परंपरा चली आ रही है, ताकि परिवार में किसी की अकाल मृत्यु न हो। यह कथा हमें सिखाती है कि अंधकार कितना भी गहरा हो, विश्वास और प्रकाश उसके आगे टिक नहीं पाता।

धनतेरस पूजा विधि: घर पर सरल विधि

धनतेरस पूजा विधि: लाल चौकी पर माता लक्ष्मी और कुबेर जी, कलश और घी के दीपक


धनतेरस की पूजा के लिए बहुत बड़ी तैयारी की आवश्यकता नहीं है। श्रद्धा और स्वच्छता ही सबसे बड़ी सामग्री है। नीचे दी गई विधि घर पर कोई भी परिवार आसानी से कर सकता है।

पूजा सामग्री

  • लाल या पीला कपड़ा और एक चौकी
  • भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी, कुबेर जी और गणेश जी का चित्र या मूर्ति
  • कलश, आम के पत्ते, जल, रोली, अक्षत (चावल), हल्दी
  • घी का दीपक और यम दीपक के लिए मिट्टी का चौमुखा दीपक
  • फूल, धूप, नैवेद्य (मिठाई), साबुत धनिया

पूजा के चरण

  1. स्वच्छता: शाम से पहले घर, विशेषकर मुख्य द्वार और पूजा स्थान को साफ करें। द्वार पर रंगोली बनाएँ।
  2. स्थापना: प्रदोष काल में चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर गणेश जी, माता लक्ष्मी, कुबेर जी और भगवान धन्वंतरि को स्थापित करें। कलश रखें।
  3. गणेश वंदना: सबसे पहले गणेश जी का ध्यान करें, फिर हाथ में जल और अक्षत लेकर पूजा का संकल्प लें।
  4. धन्वंतरि पूजन: भगवान धन्वंतरि को रोली, अक्षत, फूल अर्पित करें और परिवार के अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना करें। मंत्र: "ॐ धन्वंतरये नमः"।
  5. लक्ष्मी-कुबेर पूजन: माता लक्ष्मी और कुबेर जी को फूल, नैवेद्य अर्पित करें। नई खरीदी गई वस्तु (बर्तन या सिक्का) भी पूजा में रखें। कई परिवार साबुत धनिया भी चढ़ाते हैं।
  6. आरती: घी का दीपक जलाकर आरती करें और प्रसाद बाँटें।
  7. यम दीपक: पूजा के बाद मिट्टी के चौमुखे दीपक में तेल डालकर घर के मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जलाएँ और यमराज को प्रणाम करें।

धनतेरस पर क्या खरीदें और क्या ध्यान रखें

लोक परंपरा में धनतेरस पर नए बर्तन, विशेषकर पीतल या चाँदी के बर्तन, और सिक्के खरीदना शुभ माना जाता है। इसका भाव यह है कि भगवान धन्वंतरि कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिए घर में नया पात्र लाना उनके स्वागत का प्रतीक है। झाड़ू खरीदने की परंपरा भी कई क्षेत्रों में है, क्योंकि स्वच्छता को लक्ष्मी जी का निवास माना गया है।

फिर भी याद रखें कि शास्त्र दिखावे पर नहीं, भाव पर ज़ोर देते हैं। अपनी सामर्थ्य के अनुसार छोटी-सी वस्तु भी पूरी श्रद्धा से लाई जाए तो वही शुभ है। इस दिन किसी ज़रूरतमंद को भोजन, वस्त्र या दवा दान करना धन्वंतरि जी की सबसे सच्ची पूजा हो सकती है।

धनतेरस का आध्यात्मिक महत्व

धनतेरस हमें "धन" की सही परिभाषा सिखाता है। पहला धन है आरोग्य, जिसके देवता धन्वंतरि हैं। दूसरा धन है समृद्धि, जिसकी देवी माता लक्ष्मी हैं और जिसके रक्षक कुबेर जी हैं। तीसरा धन है जीवन, जिसकी रक्षा की प्रार्थना हम यम दीपक जलाकर करते हैं। जब ये तीनों संतुलन में होते हैं, तभी दीपावली का प्रकाश सचमुच घर के भीतर उतरता है।

धनतेरस के बाद नरक चतुर्दशी और फिर दीपावली आती है, जब हम प्रभु श्रीराम के अयोध्या लौटने का उत्सव मनाते हैं। इस तरह यह पाँच दिन का पर्व स्वास्थ्य, धर्म, विजय और प्रेम की एक सुंदर यात्रा है, जिसकी शुरुआत भगवान धन्वंतरि के आशीर्वाद से होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

धनतेरस 2026 कब है?

धनतेरस 2026 शुक्रवार, 6 नवंबर को है। द्रिक पंचांग के अनुसार त्रयोदशी तिथि 6 नवंबर सुबह 10:30 बजे से 7 नवंबर सुबह 10:47 बजे तक रहेगी।

धनतेरस पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है?

नई दिल्ली के अनुसार धनतेरस पूजा का मुहूर्त शाम 6:02 बजे से 7:57 बजे तक है, जब प्रदोष काल और वृषभ (स्थिर) लग्न साथ रहते हैं। अपने शहर का समय द्रिक पंचांग पर देख लें।

धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि की पूजा क्यों होती है?

मान्यता है कि कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को ही समुद्र मंथन से भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। वे आयुर्वेद के देवता हैं, इसलिए इस दिन परिवार के अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना की जाती है।

यम दीपक कब और कैसे जलाएँ?

धनतेरस की शाम प्रदोष काल में मिट्टी का चौमुखा दीपक तेल से जलाकर घर के मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा की ओर रखें। इसे यमराज के नाम का दीपदान माना जाता है, जो परिवार की अकाल मृत्यु से रक्षा की प्रार्थना है।

धनतेरस पर क्या खरीदना शुभ माना जाता है?

परंपरा में पीतल या चाँदी के बर्तन, सिक्के, झाड़ू और साबुत धनिया खरीदना शुभ माना जाता है। अपनी सामर्थ्य के अनुसार श्रद्धा से खरीदी गई छोटी वस्तु भी उतनी ही शुभ है।

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आप सभी को धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएँ। भगवान धन्वंतरि आपके परिवार को उत्तम स्वास्थ्य दें और माता लक्ष्मी सुख-समृद्धि। ऐसी ही पावन कथाओं के लिए सनातन कथा सागर को फ़ॉलो करें।


लेखक के बारे में: सुमित मनवाल सनातन धर्म, श्रीराम, रामायण, श्रीमद्भगवद्गीता, हनुमान जी और भगवान शिव की कथाओं को सरल हिंदी में श्रद्धा के साथ पाठकों तक पहुँचाते हैं। ऐसी ही कथाओं के लिए सनातन कथा सागर को फ़ॉलो करें। जय श्री राम।

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