लेखक: सुमित मनवाल | अपडेट: 1 नवंबर 2026
संक्षेप में उत्तर
- तुलसी विवाह 2026: शनिवार, 21 नवंबर 2026 (कार्तिक शुक्ल द्वादशी)।
- द्वादशी तिथि: 21 नवंबर सुबह 06:31 बजे से 22 नवंबर सुबह 04:56 बजे तक।
- किसका विवाह: माता तुलसी (वृंदा) का भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप से।
- समय नई दिल्ली (IST) के अनुसार, स्रोत: द्रिक पंचांग। आपके शहर में कुछ मिनट का अंतर हो सकता है।
कार्तिक मास में देव उठनी एकादशी के साथ ही भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जागते हैं, और इसके बाद आने वाला पहला मंगल उत्सव है तुलसी विवाह। इस दिन घर-आंगन की तुलसी को दुल्हन की तरह सजाकर उनका विवाह शालिग्राम जी से कराया जाता है। लोक-परंपरा में इसी दिन से विवाह, गृह-प्रवेश जैसे शुभ कार्यों का मौसम फिर से शुरू माना जाता है।
इस लेख में आप जानेंगे कि 2026 में तुलसी विवाह किस दिन है, वृंदा और जलंधर की कथा पुराणों में कैसे आती है, घर पर छोटे से परिवार के साथ यह विवाह कैसे कराएं, कौन-सी सामग्री चाहिए, और तुलसी से जुड़े कौन-से पारंपरिक नियम माने जाते हैं।
तुलसी विवाह 2026: तिथि और समय
नीचे की तालिका द्रिक पंचांग के नई दिल्ली के समय पर आधारित है। हमने 1 नवंबर 2026 को इसकी जाँच की है।
| विवरण | जानकारी (नई दिल्ली, IST) |
|---|---|
| तुलसी विवाह का दिन | शनिवार, 21 नवंबर 2026 |
| हिंदू मास और तिथि | कार्तिक, शुक्ल पक्ष द्वादशी |
| द्वादशी तिथि आरंभ | 21 नवंबर 2026, सुबह 06:31 बजे |
| द्वादशी तिथि समाप्त | 22 नवंबर 2026, सुबह 04:56 बजे |
| इससे एक दिन पहले | देव उठनी (प्रबोधिनी) एकादशी, 20 नवंबर 2026 |
एकादशी या द्वादशी: अलग-अलग परंपराएं
तुलसी विवाह की तिथि को लेकर पूरे भारत में एक जैसी परंपरा नहीं है। द्रिक पंचांग इसे कार्तिक शुक्ल द्वादशी को बताता है, इसलिए 2026 में मुख्य तिथि 21 नवंबर है। बहुत से परिवार देव उठनी एकादशी की शाम को ही तुलसी विवाह कर लेते हैं, और कुछ क्षेत्रों में यह उत्सव एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक किसी भी शुभ दिन किया जाता है। आपके परिवार या कुल-पुरोहित की जो रीति है, उसी को मानें। एकादशी के व्रत, पारण और कथा की पूरी जानकारी के लिए हमारा लेख देव उठनी एकादशी 2026: व्रत कथा, पूजा विधि और पारण समय पढ़ें।
तुलसी विवाह क्यों किया जाता है?
सनातन परंपरा में तुलसी को केवल एक पौधा नहीं, बल्कि देवी का स्वरूप माना गया है। भगवान विष्णु की पूजा तुलसी-दल के बिना अधूरी मानी जाती है, और श्रीकृष्ण को भोग लगाते समय भी तुलसी का पत्ता रखा जाता है। तुलसी विवाह इसी प्रेम और समर्पण का उत्सव है। इसमें भक्त स्वयं को कन्या के माता-पिता की भूमिका में रखकर तुलसी का कन्यादान करते हैं।
लोक-मान्यता में जिन परिवारों में बेटी नहीं होती, वे तुलसी का कन्यादान करके कन्यादान का पुण्य भाव अनुभव करते हैं। गांवों में यह उत्सव पूरे मोहल्ले का उत्सव बन जाता है: गन्ने का मंडप सजता है, मंगल गीत गाए जाते हैं और प्रसाद बांटा जाता है।
वृंदा और जलंधर की कथा
तुलसी विवाह की कथा पुराणों में कुछ अंतर के साथ मिलती है। यहां हम मुख्य रूप से शिव पुराण (रुद्र संहिता, युद्ध खंड, जलंधर प्रसंग) और पद्म पुराण (उत्तर खंड) में आने वाली कथा का सार अपने शब्दों में दे रहे हैं। अध्याय क्रमांक अलग-अलग संस्करणों में कुछ बदल जाते हैं, इसलिए हमने प्रसंग का नाम दिया है।
1. जलंधर का जन्म
शिव पुराण के अनुसार एक बार भगवान शिव के तीसरे नेत्र से निकला तेज समुद्र में जा गिरा। उसी तेज से एक बालक उत्पन्न हुआ, जिसका नाम जलंधर पड़ा। समुद्र से जन्म लेने के कारण वह अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी था। बड़ा होकर वह असुरों का राजा बना और उसका विवाह कालनेमि की पुत्री वृंदा से हुआ।
2. वृंदा का पतिव्रत
वृंदा भगवान विष्णु की परम भक्त थीं और उनका पतिव्रत धर्म अटल था। कथा कहती है कि वृंदा के सतीत्व की शक्ति ही जलंधर का कवच बन गई। जब तक वृंदा का पतिव्रत अखंड था, तब तक जलंधर को कोई पराजित नहीं कर सकता था। इस बल के अहंकार में जलंधर ने देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया और अंत में भगवान शिव से ही युद्ध छेड़ दिया।
3. भगवान विष्णु की लीला
देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने जलंधर का रूप धारण किया और वृंदा के पास पहुंचे। वृंदा उन्हें अपना पति समझ बैठीं, और इसी क्षण उनका पतिव्रत-कवच टूट गया। उधर युद्धभूमि में भगवान शिव ने जलंधर का वध कर दिया। जब वृंदा को सच्चाई का पता चला, तो वे अत्यंत दुखी हुईं।
4. वृंदा का शाप और तुलसी का प्रकट होना
कथा के एक रूप में वृंदा ने भगवान विष्णु को शाप दिया कि वे पत्थर बन जाएं। भगवान ने भक्त का शाप सिर झुकाकर स्वीकार किया और शालिग्राम शिला के रूप में प्रकट हुए। शिव पुराण के प्रसंग में वृंदा यह भी कहती हैं कि जैसे उन्हें पति-वियोग सहना पड़ा, वैसे ही भगवान को भी पत्नी-वियोग सहना पड़ेगा। परंपरा इसे श्रीराम अवतार में सीता-वियोग से जोड़ती है। इसके बाद वृंदा ने अग्नि में प्रवेश किया।
कथा के अनुसार जहां वृंदा भस्म हुईं, वहां तुलसी का पौधा उगा। भगवान विष्णु ने वरदान दिया कि तुलसी उन्हें सदा सबसे प्रिय रहेंगी, उनकी कोई पूजा तुलसी के बिना पूर्ण नहीं होगी, और हर वर्ष शालिग्राम रूप में उनका विवाह तुलसी से होगा। यही तुलसी विवाह का आधार है।
तुलसी और शंखचूड़ की कथा (ब्रह्मवैवर्त पुराण)
ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृति खंड में एक मिलती-जुलती कथा है, जिसमें तुलसी का विवाह शंखचूड़ नामक असुर से होता है। वहां भी तुलसी के पतिव्रत के कारण शंखचूड़ अजेय था और अंत में भगवान शिव उसका वध करते हैं। इस कथा में भगवान विष्णु तुलसी को वरदान देते हैं कि उनका शरीर गंडकी नदी बनेगा, उनके केश तुलसी के पौधे बनेंगे, और वे स्वयं गंडकी के तट पर शालिग्राम शिला बनकर रहेंगे। नेपाल की गंडकी नदी से मिलने वाली शालिग्राम शिलाओं की परंपरा इसी कथा से जुड़ी है।
कथा से क्या सीख मिलती है?
- भक्ति की महिमा: भगवान स्वयं अपने भक्त का शाप स्वीकार करते हैं। यह बताता है कि ईश्वर के लिए भक्त का मान कितना बड़ा है।
- अहंकार का अंत: जलंधर के पास अपार बल था, पर अहंकार और अधर्म के कारण उसका अंत हुआ।
- त्याग का सम्मान: वृंदा के समर्पण को भगवान ने अमर कर दिया। आज हर हिंदू घर के आंगन में तुलसी का स्थान इसी का प्रतीक है।
घर पर तुलसी विवाह कैसे करें: सरल विधि
तुलसी विवाह के लिए बड़ा आयोजन ज़रूरी नहीं है। घर के चार-पांच सदस्य भी श्रद्धा से यह विवाह करा सकते हैं। नीचे दी गई विधि सामान्य गृहस्थ परंपरा पर आधारित है। अगर आपके परिवार में कोई अलग रीति है, तो उसे प्राथमिकता दें।
आवश्यक सामग्री
| श्रेणी | सामग्री |
|---|---|
| मुख्य | तुलसी का गमला, शालिग्राम जी (न हों तो भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की प्रतिमा/चित्र) |
| मंडप | 4 गन्ने, आम के पत्ते, फूलों की माला, रंगोली |
| श्रृंगार (तुलसी के लिए) | लाल चुनरी, चूड़ियां, बिंदी, सिंदूर, मेहंदी, छोटी साड़ी या वस्त्र |
| पूजन | कलश, जल, रोली, अक्षत, हल्दी, चंदन, धूप, दीपक, कपूर, पीले वस्त्र (शालिग्राम जी के लिए) |
| भोग | मौसमी फल, आंवला, सिंघाड़ा, बेर, मिठाई, पंचामृत |
चरण-दर-चरण विधि
- तैयारी: शाम से पहले घर और आंगन साफ करें। तुलसी के गमले के चारों ओर रंगोली बनाएं और गमले को गेरू या हल्दी से सजाएं।
- मंडप: गमले के चारों कोनों पर गन्ने खड़े करके ऊपर से बांध दें और आम के पत्तों व फूलों से मंडप सजाएं।
- दुल्हन का श्रृंगार: माता तुलसी को लाल चुनरी ओढ़ाएं और सुहाग की सामग्री अर्पित करें।
- वर पक्ष: शालिग्राम जी को पंचामृत और फिर शुद्ध जल से स्नान कराएं, पीला वस्त्र पहनाएं और एक चौकी पर तुलसी के दाहिनी ओर विराजमान करें।
- संकल्प और गणेश पूजन: हाथ में जल और अक्षत लेकर संकल्प करें कि आप श्रद्धा से तुलसी-शालिग्राम विवाह करा रहे हैं। सबसे पहले गणेश जी का स्मरण और पूजन करें।
- पूजन: तुलसी और शालिग्राम जी को रोली, चंदन, हल्दी, अक्षत, फूल, धूप और दीप अर्पित करें। "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जाप करते रहें।
- कन्यादान और फेरे: घर के बड़े सदस्य तुलसी का कन्यादान करें। फिर कोई सदस्य शालिग्राम जी को हाथ में लेकर तुलसी के गमले की सात परिक्रमा करे। परिक्रमा के समय मंगल गीत गाए जा सकते हैं।
- आरती और भोग: "ॐ जय जगदीश हरे" आरती करें, भोग लगाएं और प्रसाद सबमें बांटें।
पूजा के बाद तुलसी पर चढ़ाई गई चुनरी और सुहाग सामग्री किसी सुहागिन महिला या मंदिर को दान की जा सकती है। यह भी लोक-परंपरा का हिस्सा है।
तुलसी नामाष्टक: अर्थ सहित
ब्रह्मवैवर्त पुराण (प्रकृति खंड, तुलसी उपाख्यान) में माता तुलसी के आठ नाम बताए गए हैं। तुलसी विवाह की पूजा में इनका पाठ बहुत प्रचलित है:
वृन्दा वृन्दावनी विश्वपूजिता विश्वपावनी।
पुष्पसारा नन्दिनी च तुलसी कृष्णजीवनी॥
हमारा भावार्थ: वृंदा (भक्ति का पुंज), वृंदावनी (वृंदावन में वास करने वाली), विश्वपूजिता (जिनकी पूरा संसार पूजा करता है), विश्वपावनी (संसार को पवित्र करने वाली), पुष्पसारा (सभी फूलों में श्रेष्ठ), नंदिनी (आनंद देने वाली), तुलसी (जिनकी तुलना किसी से नहीं) और कृष्णजीवनी (जो श्रीकृष्ण को प्राणों के समान प्रिय हैं)। इन नामों को समझकर लेने से पूजा में भाव और गहरा होता है।
तुलसी से जुड़े पारंपरिक नियम
ये नियम लोक और शास्त्रीय परंपरा से चले आ रहे हैं। इन्हें श्रद्धा और सुविधा के अनुसार अपनाएं:
- परंपरा में रविवार, एकादशी और संध्या के बाद तुलसी के पत्ते तोड़ना वर्जित माना जाता है। पूजा के लिए पत्ते एक दिन पहले तोड़कर रख सकते हैं।
- पत्ते तोड़ते समय नाखून से नोचने के बजाय उंगलियों से धीरे से तोड़ें और मन में तुलसी माता से अनुमति लें।
- शाम को तुलसी के पास घी का दीपक जलाना कार्तिक मास में विशेष शुभ माना जाता है।
- भगवान शिव और गणेश जी की पूजा में तुलसी चढ़ाने की परंपरा नहीं है, जबकि विष्णु, श्रीराम और श्रीकृष्ण की पूजा में यह अनिवार्य मानी जाती है।
- सूखी तुलसी को फेंकने के बजाय बहते जल या मिट्टी में विसर्जित करें।
देव उठनी एकादशी और तुलसी विवाह का संबंध
आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी) से भगवान विष्णु योगनिद्रा में जाते हैं, और इन चार महीनों को चातुर्मास कहा जाता है। कार्तिक शुक्ल एकादशी को वे जागते हैं। भगवान के जागने के बाद पहला उत्सव उनका विवाह ही होता है, इसलिए तुलसी विवाह को शुभ कार्यों की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। कई परिवार एकादशी को व्रत रखते हैं और द्वादशी को पारण के बाद तुलसी विवाह करते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. तुलसी विवाह 2026 में कब है?
द्रिक पंचांग के अनुसार तुलसी विवाह शनिवार, 21 नवंबर 2026 को है। कार्तिक शुक्ल द्वादशी 21 नवंबर सुबह 06:31 बजे से 22 नवंबर सुबह 04:56 बजे तक (नई दिल्ली) रहेगी।
2. क्या तुलसी विवाह एकादशी के दिन भी कर सकते हैं?
हां। कई क्षेत्रों और परिवारों में देव उठनी एकादशी (2026 में 20 नवंबर) की शाम को ही तुलसी विवाह किया जाता है। कुछ जगहों पर यह कार्तिक पूर्णिमा तक किया जाता है। अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार दिन चुनें।
3. शालिग्राम न हो तो तुलसी विवाह कैसे करें?
शालिग्राम शिला न हो तो भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण या लड्डू गोपाल की प्रतिमा या चित्र को वर के रूप में रखकर विवाह कराया जा सकता है। सबसे महत्वपूर्ण आपकी श्रद्धा है।
4. तुलसी विवाह में गन्ने का मंडप क्यों बनाते हैं?
कार्तिक में गन्ने की नई फसल आती है और गन्ना मिठास तथा समृद्धि का प्रतीक है। इसलिए लोक-परंपरा में तुलसी विवाह का मंडप गन्नों से बनाया जाता है और गन्ना प्रसाद के रूप में भी बांटा जाता है।
5. वृंदा कौन थीं?
पुराणों के अनुसार वृंदा कालनेमि की पुत्री, असुरराज जलंधर की पत्नी और भगवान विष्णु की परम भक्त थीं। उनके पतिव्रत और भक्ति के सम्मान में भगवान विष्णु ने उन्हें तुलसी रूप में सदा अपने पास रहने का वरदान दिया।
स्रोत / संदर्भ
- शिव पुराण, रुद्र संहिता, युद्ध खंड: जलंधर जन्म और वध प्रसंग
- पद्म पुराण, उत्तर खंड: जलंधर-वृंदा प्रसंग
- ब्रह्मवैवर्त पुराण, प्रकृति खंड: तुलसी उपाख्यान और तुलसी नामाष्टक
- तिथि और समय: द्रिक पंचांग, तुलसी विवाह 2026 (नई दिल्ली), 1 नवंबर 2026 को जाँचा गया
यह लेख धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं की जानकारी के लिए है। पूजा की विधि में अपने परिवार या पुरोहित की परंपरा को प्राथमिकता दें।