लेखक: सुमित मनवाल | अपडेट: 31 अक्टूबर 2026
संक्षेप में उत्तर
- देव उठनी (प्रबोधिनी) एकादशी 2026: शुक्रवार, 20 नवंबर 2026 (स्मार्त/गृहस्थ परंपरा)।
- वैष्णव (ISKCON आदि) परंपरा: शनिवार, 21 नवंबर 2026 (गौण एकादशी)।
- पारण (व्रत खोलने का समय): 21 नवंबर, दोपहर 01:11 से 03:18 बजे तक; वैष्णव व्रत का पारण 22 नवंबर, सुबह 06:49 से 08:56 बजे तक।
- सभी समय नई दिल्ली के अनुसार (IST), स्रोत: द्रिक पंचांग। अपने शहर के लिए कुछ मिनट का अंतर संभव है।
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देव उठनी एकादशी, देवोत्थान एकादशी या प्रबोधिनी एकादशी कहा जाता है। "प्रबोधिनी" का अर्थ है जगाने वाली। मान्यता है कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) से भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में चले जाते हैं और चार महीने बाद इसी दिन जागते हैं। इन चार महीनों को चातुर्मास कहते हैं। देव उठनी एकादशी के साथ चातुर्मास पूरा होता है, और परंपरा के अनुसार विवाह, गृह-प्रवेश जैसे मांगलिक कार्यों का शुभ समय फिर से आरंभ माना जाता है।
इस लेख में आप जानेंगे कि 2026 में यह एकादशी किस दिन है, 20 और 21 नवंबर दोनों तारीखें क्यों बताई जा रही हैं, पारण का सही समय क्या है, घर पर पूजा कैसे करें, और इस दिन से जुड़ी कथा क्या है।
देव उठनी एकादशी 2026: तिथि और पारण समय
नीचे दी गई तालिका द्रिक पंचांग के नई दिल्ली के समय पर आधारित है। हमने 31 अक्टूबर 2026 को इन समयों की जाँच की है।
| विवरण | समय (नई दिल्ली, IST) |
|---|---|
| एकादशी तिथि आरंभ | 20 नवंबर 2026, सुबह 07:15 बजे |
| एकादशी तिथि समाप्त | 21 नवंबर 2026, सुबह 06:31 बजे |
| स्मार्त (गृहस्थ) व्रत | शुक्रवार, 20 नवंबर 2026 |
| पारण का समय (स्मार्त) | 21 नवंबर, दोपहर 01:11 से 03:18 बजे तक |
| पारण के दिन हरि वासर समाप्त | 21 नवंबर, दोपहर 12:07 बजे |
| गौण / वैष्णव व्रत | शनिवार, 21 नवंबर 2026 |
| पारण का समय (गौण/वैष्णव) | 22 नवंबर, सुबह 06:49 से 08:56 बजे तक |
20 या 21 नवंबर: दो तारीखें क्यों?
इस वर्ष एकादशी तिथि 20 नवंबर को सूर्योदय के बाद सुबह 07:15 बजे शुरू होकर 21 नवंबर को सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो रही है। यानी एकादशी किसी भी दिन के सूर्योदय को स्पर्श नहीं कर रही। ऐसी स्थिति में पंचांग गणना की दो परंपराएँ अलग-अलग निर्णय देती हैं। गृहस्थ लोग सामान्यतः स्मार्त परंपरा मानते हैं और 20 नवंबर को व्रत रखते हैं। वैष्णव संप्रदाय, जैसे ISKCON, उस दिन को व्रत के लिए नहीं लेते जिस दिन अरुणोदय के समय दशमी चल रही हो, इसलिए वे 21 नवंबर को व्रत रखते हैं।
दोनों ही परंपराएँ श्रद्धा पर आधारित हैं और दोनों का सम्मान है। आपके परिवार या गुरु-परंपरा में जो नियम चलता है, उसी का पालन करें। अगर कोई विशेष परंपरा नहीं है, तो अधिकतर घरों में 20 नवंबर का व्रत रखा जाएगा।
पारण में हरि वासर का ध्यान क्यों?
एकादशी का व्रत अगले दिन द्वादशी तिथि में खोला जाता है। द्वादशी का पहला चौथाई भाग "हरि वासर" कहलाता है, और परंपरा के अनुसार इस दौरान व्रत नहीं खोला जाता। इस बार 21 नवंबर को हरि वासर दोपहर 12:07 बजे समाप्त होगा, इसलिए स्मार्त व्रत का पारण दोपहर 01:11 बजे के बाद बताया गया है।
देव उठनी एकादशी का महत्व
यह एकादशी वर्ष की सबसे प्रमुख एकादशियों में गिनी जाती है। परंपरा में एकादशी व्रत के माहात्म्य का वर्णन पद्म पुराण और स्कंद पुराण से जोड़ा जाता है। स्कंद पुराण के वैष्णव खंड में कार्तिक मास का विस्तृत माहात्म्य मिलता है, और पद्म पुराण के उत्तर खंड में अलग-अलग एकादशियों के माहात्म्य की कथाएँ प्रचलित हैं। अलग-अलग संस्करणों में श्लोक संख्या और कथा के विवरण में अंतर मिलता है, इसलिए हम यहाँ भाव के आधार पर बात कर रहे हैं, किसी एक श्लोक संख्या का दावा नहीं कर रहे।
इस दिन का संदेश बहुत सुंदर है: जैसे भगवान जागते हैं, वैसे ही भक्त भी अपने भीतर के आलस्य और अंधकार को छोड़कर नई ऊर्जा से धर्म, सेवा और सत्कर्म की ओर बढ़े। कार्तिक मास दीपदान का महीना है, और देव उठनी एकादशी पर घर-आँगन में दीपक जलाकर भगवान का स्वागत करने की परंपरा इसी भाव को दिखाती है।
तुलसी विवाह से संबंध
देव उठनी एकादशी के साथ ही तुलसी विवाह का पर्व भी जुड़ा है। कई क्षेत्रों में एकादशी के दिन, और कई जगहों पर द्वादशी या कार्तिक पूर्णिमा तक, तुलसी जी का विवाह भगवान शालिग्राम (विष्णु स्वरूप) से कराया जाता है। 2026 में बहुत से पंचांगों में तुलसी विवाह 21 नवंबर को बताया गया है। अपने क्षेत्र की परंपरा के अनुसार दिन चुनें।
महाराष्ट्र में कार्तिकी एकादशी
महाराष्ट्र में यही दिन कार्तिकी एकादशी के नाम से जाना जाता है। आषाढ़ी एकादशी की तरह इस दिन भी पंढरपुर में भगवान विट्ठल के दर्शन के लिए वारकरी भक्तों की बड़ी भीड़ उमड़ती है। इससे पता चलता है कि यह पर्व पूरे भारत में अलग-अलग रूपों में, पर एक ही भक्ति-भाव से मनाया जाता है।
देव उठनी एकादशी व्रत कथा
इस एकादशी से जुड़ी कई कथाएँ प्रचलित हैं। नीचे हम दो कथाएँ अपने शब्दों में प्रस्तुत कर रहे हैं। पहली कथा चातुर्मास और भगवान की योगनिद्रा के भाव से जुड़ी है, और दूसरी लोक में प्रचलित व्रत कथा है, जो घरों में पूजा के समय सुनाई जाती है।
कथा 1: भगवान की योगनिद्रा और राजा बलि
लोक-मान्यता के अनुसार जब भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण कर राजा बलि से तीन पग भूमि माँगी, तब बलि ने बिना संकोच अपना सब कुछ भगवान को अर्पित कर दिया। बलि की इस दानशीलता और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने उसे पाताल लोक का राज्य दिया और वरदान माँगने को कहा। बलि ने विनम्रता से कहा कि प्रभु, आप सदा मेरे पास रहें।
भक्त के प्रेम में बँधे भगवान ने यह स्वीकार किया। परंपरा में कहा जाता है कि इसी कारण भगवान वर्ष के चार महीने पाताल में बलि के पास निवास करते हैं, और उस अवधि को उनकी योगनिद्रा के रूप में देखा जाता है। देवशयनी एकादशी से भगवान शयन करते हैं और प्रबोधिनी एकादशी को जागकर फिर से सृष्टि के पालन का कार्य संभालते हैं। यह कथा बताती है कि भगवान भक्त के प्रेम के अधीन हैं, और सच्चा दान वही है जो अहंकार छोड़कर किया जाए।
कथा 2: राजा का नियम और सेवक की श्रद्धा
एक प्रचलित कथा के अनुसार किसी राज्य में एकादशी का बहुत सम्मान था। राजा से लेकर प्रजा तक, सभी एकादशी के दिन अन्न ग्रहण नहीं करते थे। एक दिन एक व्यक्ति राजा के पास नौकरी माँगने आया। राजा ने कहा, "तुम्हें काम मिल जाएगा, पर एक शर्त है: एकादशी के दिन तुम्हें अन्न नहीं मिलेगा।" व्यक्ति ने हाँ कर दी।
जब पहली एकादशी आई, तो उसे फलाहार दिया गया। वह भूख सहन नहीं कर पाया और राजा से विनती करने लगा कि उसे थोड़ा अन्न दे दिया जाए। राजा ने नियम याद दिलाया, पर उसकी हालत देखकर अंत में उसे आटा, दाल और चावल दे दिए। वह नदी किनारे गया, स्नान किया, भोजन बनाया और फिर भाव से भगवान को पुकारा, "प्रभु, भोजन तैयार है, पहले आप ग्रहण करें।" कथा में कहा गया है कि उसकी सरल श्रद्धा देखकर भगवान स्वयं पीतांबर पहने चतुर्भुज रूप में आए और उसके साथ प्रेम से भोजन किया।
अगली एकादशी पर उसने राजा से दोगुना सामान माँगा और कहा कि अब भगवान भी उसके साथ भोजन करते हैं। राजा को विश्वास नहीं हुआ, तो वह छिपकर देखने गया। सेवक ने भोजन बनाकर भगवान को पुकारा, पर इस बार भगवान नहीं आए। व्याकुल होकर उसने कहा कि अगर प्रभु नहीं आएँगे, तो वह नदी में प्राण त्याग देगा। जैसे ही वह आगे बढ़ा, भगवान प्रकट हुए, उसे रोका और साथ बैठकर भोजन किया।
राजा यह देखकर समझ गया कि केवल नियम निभाना काफी नहीं, मन का शुद्ध और सच्चा भाव ही भगवान को सबसे प्रिय है। उसी दिन से राजा ने व्रत के साथ-साथ अपने मन को भी निर्मल रखने का संकल्प लिया। इस कथा का संदेश यही है कि व्रत भूखे रहने का नाम नहीं, बल्कि भगवान से प्रेम और श्रद्धा से जुड़ने का साधन है।
देव उठनी एकादशी पूजा विधि (घर पर)
नीचे दी गई विधि सरल रूप में है, जिसे कोई भी परिवार घर पर कर सकता है। अपनी कुल-परंपरा या पुरोहित के निर्देश को प्राथमिकता दें।
- संकल्प: सुबह स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनें, भगवान विष्णु का ध्यान करें और अपनी सामर्थ्य के अनुसार व्रत का संकल्प लें।
- पूजा स्थान: घर के मंदिर या आँगन को साफ करें। कई घरों में गेरू और चावल के आटे से भगवान के चरणों की आकृति बनाई जाती है।
- पूजन: भगवान विष्णु या शालिग्राम जी को जल, चंदन, पीले फूल, तुलसी दल, धूप और दीप अर्पित करें। ऋतु फल, सिंघाड़ा, गन्ना, शकरकंद जैसी मौसमी चीज़ें भोग में रखने की परंपरा है।
- मंत्र-जप: "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का श्रद्धा से जप करें। विष्णु सहस्रनाम का पाठ भी कर सकते हैं।
- देव उठाना: शाम को दीपक जलाकर, शंख या घंटी बजाकर भगवान को जगाने की प्रार्थना करें। नीचे दिया गया पारंपरिक श्लोक बोला जाता है।
- कथा और आरती: परिवार के साथ व्रत कथा सुनें और "ॐ जय जगदीश हरे" आरती करें।
- पारण: अगले दिन ऊपर दिए गए पारण समय में तुलसी दल और जल ग्रहण कर, फिर सात्विक भोजन से व्रत खोलें।
भगवान को जगाने का पारंपरिक श्लोक
उत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पते।
त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम्॥
हमारा सरल भावार्थ: हे गोविंद, उठिए। हे जगत के स्वामी, निद्रा का त्याग कीजिए। हे जगन्नाथ, जब आप सोते हैं तो मानो यह पूरा संसार भी सो जाता है। यह श्लोक भक्त की उस भावना को व्यक्त करता है कि भगवान के जागने से ही संसार में चेतना और मंगल का संचार होता है।
व्रत के प्रकार और सावधानी
परंपरा में एकादशी व्रत कई तरह से रखा जाता है: निर्जल (बिना जल), केवल जल, फलाहार, या एक समय सात्विक भोजन। अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार ही व्रत चुनें। गर्भवती महिलाएँ, बुज़ुर्ग, बच्चे, और जो लोग किसी बीमारी या दवा पर हैं, वे व्रत रखने से पहले डॉक्टर की सलाह अवश्य लें। भक्ति का मूल भाव है, और भाव से किया गया सरल पूजन भी पूर्ण माना जाता है।
इस दिन क्या करें और क्या न करें
- करें: भगवान का नाम-स्मरण, दीपदान, तुलसी पूजा, ज़रूरतमंदों को अन्न-वस्त्र का दान, और परिवार के साथ कथा-श्रवण।
- करें: मन, वाणी और व्यवहार में संयम रखें; किसी से कटु वचन न बोलें।
- न करें: परंपरा के अनुसार एकादशी पर चावल और तामसिक भोजन से परहेज़ किया जाता है।
- न करें: तुलसी दल एक दिन पहले ही तोड़कर रख लें; कई परिवारों में एकादशी के दिन तुलसी तोड़ना वर्जित माना जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. देव उठनी एकादशी 2026 कब है?
द्रिक पंचांग (नई दिल्ली) के अनुसार स्मार्त परंपरा में शुक्रवार, 20 नवंबर 2026 को, और वैष्णव परंपरा में शनिवार, 21 नवंबर 2026 को।
2. देव उठनी एकादशी 2026 का पारण समय क्या है?
20 नवंबर का व्रत रखने वाले 21 नवंबर को दोपहर 01:11 से 03:18 बजे के बीच पारण करें। 21 नवंबर का व्रत रखने वाले 22 नवंबर को सुबह 06:49 से 08:56 बजे के बीच पारण करें (नई दिल्ली समय)।
3. देव उठनी एकादशी को प्रबोधिनी एकादशी क्यों कहते हैं?
"प्रबोधन" का अर्थ है जागना या जगाना। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जागते हैं, इसलिए इसे प्रबोधिनी या देवोत्थान एकादशी कहा जाता है।
4. क्या देव उठनी एकादशी के बाद शादियाँ शुरू हो जाती हैं?
परंपरा के अनुसार चातुर्मास में विवाह जैसे मांगलिक कार्य टाले जाते हैं, और देव उठनी एकादशी के बाद शुभ समय फिर शुरू माना जाता है। हालाँकि विवाह का सटीक मुहूर्त पंचांग और ज्योतिषीय गणना से ही तय होता है, इसलिए अपने पुरोहित से मुहूर्त अवश्य निकलवाएँ।
5. क्या बीमार या बुज़ुर्ग व्यक्ति यह व्रत रख सकते हैं?
स्वास्थ्य सबसे पहले है। ऐसे लोग डॉक्टर की सलाह से फलाहार या एक समय सात्विक भोजन वाला हल्का व्रत रख सकते हैं, या केवल पूजा, जप और कथा-श्रवण कर सकते हैं। भाव से की गई भक्ति ही इस पर्व का सार है।
6. तुलसी विवाह 2026 कब है?
तुलसी विवाह की तिथि क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है। 2026 में बहुत से पंचांगों में यह शनिवार, 21 नवंबर को बताया गया है। अपने क्षेत्र के पंचांग से पुष्टि कर लें।
निष्कर्ष
देव उठनी एकादशी केवल एक तिथि नहीं, बल्कि नए आरंभ का पर्व है। चार महीने के चातुर्मास के बाद यह दिन हमें याद दिलाता है कि जैसे भगवान जागते हैं, वैसे ही हमें भी अपने भीतर की श्रद्धा, सेवा और सद्भाव को जगाना चाहिए। 2026 में 20 या 21 नवंबर, जिस भी दिन आपकी परंपरा व्रत रखती हो, उस दिन शांत मन से भगवान विष्णु का स्मरण करें, दीप जलाएँ और परिवार के साथ इस पावन पर्व का आनंद लें। जय श्री हरि!
स्रोत / संदर्भ
- तिथि और पारण समय: द्रिक पंचांग – प्रबोधिनी एकादशी 2026 (नई दिल्ली), 31 अक्टूबर 2026 को जाँचा गया।
- कार्तिक मास माहात्म्य: स्कंद पुराण (वैष्णव खंड); एकादशी माहात्म्य: पद्म पुराण (उत्तर खंड)। संस्करणों में श्लोक संख्या भिन्न हो सकती है।
- कथाएँ लोक-परंपरा में प्रचलित रूप के आधार पर हमारे अपने शब्दों में लिखी गई हैं। संस्कृत श्लोक पारंपरिक है और भावार्थ हमारा अपना है।